उज्जैन एक ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी है। यहाँ के मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं। जिसमे विशेष तौर पर यहाँ का महाकाल मंदिर, जो कि भगवान् शिव का मंदिर है और यह भारत भर के बारह ज्योतिर्लिंग में एक है।
अवन्तिकायां विहितावतारं
 मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम
अकालमृत्योः परिक्षणार्थ
 वन्दे महाकाल महासुरेशम् //
     अर्थात्  अवन्तिका (उज्जैन) में भक्तों को मोक्ष प्रदान करने और अकाल मृत्यु से बचाने के लिये जिनका अवतार हुआ है उन भगवान् महाकाल की मै वन्दना करता हूँ

     शिव पुराण की कोटि रूद्र संहिता के सोलहवे अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान् महाकाल के संबंध में सूत जी द्वारा जिस कथा का वर्णन किया है उस के अनुसार अवन्ती नगरी(उज्जैन) में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग का पूजन करता था उन दिनों रमाल पर्वत पर दूषण नाम का राक्षस ब्रह्माजी से प्राप्त वरदान के कारण सभी धर्मस्थलों के धार्मिक कार्यों को बाधित करता था। उसने अवन्ती नगरी में भी ब्राह्मणों से धर्म कर्म के कार्य छोड़ देने को कहा नहीं मानने पर राक्षस की सेना ने उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया जन त्रस्त होकर भगवान् शंकर की शरण में जाकर स्तुति करने लगे, तब ब्राह्मण जहाँ पार्थिव शिवलिंग का पूजन करता था वहाँ विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव का विराट स्वरुप प्रकट हुआ उन्होंने भक्तों को आश्वस्त किया और एक हुँकार के साथ राक्षस और उसकी सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात भक्तों से वरदान माँगने को कहा। अवन्तिका वासियों ने प्रार्थना की-

महाकाल महादेव ! दुष्ट दण्ड कर प्रभो
 मुक्ति प्रयच्छ  नः शम्भो  संसाराम्बुधितः शिवः
अत्रैव लोक रक्षार्थ स्थातव्यं हि त्वया शिव
स्वदर्श कान नरांशम्भो तारय त्वं सदा प्रभोः //
 अर्थात् हे महाकाल महादेव! दुष्टों को दंड देने वाले भगवान्, हमें संसार सागर से मुक्ति प्रदान करें तथा जनरक्षा के निमित्त यहीं निवास करें, आपके इसी स्वरूप के दर्शन करने वाले मनुष्यों  का उद्धार करें
 भक्तों की प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान् महाकल वहीँ विराजित हुए, तब से वे अवन्तिका(उज्जैन) में विराजित हैं।
(समाचार-पत्र दैनिक भास्कर से साभार)



श्रीमहाकालेश्वर मन्दिर

 

भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक मात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मन्दिर मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के पूर्वी तट के निकट स्थित है। इस मन्दिर का इतिहास पुराना है और इसका उल्लेख शिवपुराण, नृसिंहपुराण, स्कन्दपुराण, वराहपुराण आदि ग्रंथों में मिलता है।

           इस मन्दिर में शिखर के निकट श्रीनागचंद्रेश्वर मन्दिर स्थित है, जिसे वर्ष में एक बार श्रावण मास में नागपंचमी के दिन दर्शनार्थ खोला जाता है। इससे नीचे के तल अर्थात भूतल पर श्रीओंकारेश्वर मन्दिर स्थित है जबकि गर्भगृह में भगवान् श्रीमहाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है। गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग पूर्व में कार्तिकेय, उत्तर में पार्वती एवं पूर्व में श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित है। गर्भगृह का द्वार नक्काशीदार रजत पत्र से  सुशोभित है। गर्भगृह के बाहर शिव वाहन नंदिकेश्वर विराजित है। सभा मंडप में श्रीगणेश, देवी अन्नपूर्णा, श्रीराम मन्दिर एवं उज्जैन की अधिष्ठात्री देवी उज्जयिनी माता का मन्दिर भी स्थापित हैं। सभा मंडप के सम्मुख  कोटितीर्थ कुण्ड स्थापित है। मन्दिर के पृष्ठ भाग में भव्य वृद्ध महाकालेश्वर मन्दिर एवं बाल हनुमान मदिर स्थापित हैं।

मन्दिर प्रांगण में सिद्धि गणेश मन्दिर, स्वप्नेश्वर महादेव मन्दिर, साक्षी गोपाल मन्दिर, नीलकंठेश्वर महादेव मन्दिर एवं नवग्रह स्थापित हैं। स्वप्नेश्वर मन्दिर में निकट ही नृसिंह मन्दिर एवं बद्रीनारायण मन्दिर स्थित हैं।

मन्दिर का पुनर्निर्माण सिंधिया काल में हुआ है। दर्शनार्थियों की सुविधा हेतु प्रशासन ने वर्ष 1980 से कई अन्य निर्माण मन्दिर प्रांगण में किये हैं। प्रातः चार बजे भस्म आरती के साथ ही मन्दिर के पट खोले जाते हैं जो रात ग्यारह बजे शयन आरती के पश्चात् बन्द होते हैं। दोपहर पश्चात् प्रतिदिन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का मनमोहक शृंगार किया जाता है।

          श्रावण मास एवं भादौ की अमावस्या तक आये प्रति सोमवार सांध्य समय श्रीमहाकालेश्वर के रजत मुघौटों की सवारी निकाली जाती है। इसके अंतर्गत आने वाले अंतिम सोमवार को शाही सवारी निकाली जाती है जिसमें जिसमें नगर के भजन मंडल, अखाड़े एवं मध्य-प्रदेश का पुलिस दल भी सम्मिलित होता है। सवारी के दर्शन हेतु बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन सवारी मार्ग के आस-पास एकत्रित होते हैं।

          महाशिवरात्रि के अवसर पर मन्दिर में शिव विवाह का भव्य आयोजन किया जाता है। इसके अगले दिन प्रातः एवं दोपहर समय अर्थात् दो बार भस्म आरती की जाती है।