Monday, March 11, 2013

भारतीय सनातनी छन्द - मेरी कुछ रचनाएं!


कुंडलिया छंद


दिल्ली के दरबार में, चले न जन  का जोर,
बैठाए   खुद   आपने,  मन  के   काले   चोर/
मन   के काले चोर,  कर  रहे   भाषणबाजी,
लगता है यह शोर, नहीं अब  जनता राजी,
जन जन में आक्रोश,उड़ाते जब ये खिल्ली,
धर लो मन संकल्प,न जाएँ अब ये  दिल्ली//१//


दिल्ली    हांड़ी काठ की,  ताप   बढे  जर जाय,
शीत लहर   है देश में,  दिल्ली   तो   झुलसाय/
दिल्ली   तो  झुलसाय,  सुरक्षित   रही न नारी,
कौन हमें बतलाय  ,  कौन  सी  यह   बीमारी,
ले लो प्रण इस वर्ष ,  झौंक  दो  पूरी    सिल्ली,
होय न अब  दुष्कर्म ,  बार   दो  चाहे दिल्ली//२//

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