कुंडलिया छंद
दिल्ली के दरबार में, चले न जन का जोर,
बैठाए खुद आपने, मन के काले चोर/
मन के काले चोर, कर रहे भाषणबाजी,
लगता है यह शोर, नहीं अब जनता राजी,
जन जन में आक्रोश,उड़ाते जब ये खिल्ली,
धर लो मन संकल्प,न जाएँ अब ये दिल्ली//१//
दिल्ली हांड़ी काठ की, ताप बढे जर जाय,
शीत लहर है देश में, दिल्ली तो झुलसाय/
दिल्ली तो झुलसाय, सुरक्षित रही न नारी,
कौन हमें बतलाय , कौन सी यह बीमारी,
ले लो प्रण इस वर्ष , झौंक दो पूरी सिल्ली,
होय न अब दुष्कर्म , बार दो चाहे दिल्ली//२//
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