बूँदे लेकर रसभरी ,
वसुधा को महकाय |
क्या है मन में मेघ
के, कोई समझ न पाय ||
कोई समझ न पाय, किसे
यह तर कर देगा,
कब तोड़ेगा आस, कहाँ
जाकर बरसेगा,
नीरद करे निराश, न
मन को सपने देकर,
बरसे रिमझिम नित्य,
नृत्यरत बूँदे लेकर ||
बेसुध घन बरसा रहे,
वहीँ अनवरत नीर |
जहाँ ह्रदय घायल
पडा, सहता है नित पीर ||
सहता है नित पीर,
विरह का पाला लेकर,
ख़ुशी गई है लौट ,
जिसे बस आँसू देकर,
उसे नहीं है काम, भिगोये
क्योंकर वह तन,
छोडो उसका धाम, इसी
क्षण ओ बेसुध घन ||
~ Ashok Kumar Raktale.
Ujjain (M.P.)
09827256343.
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